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रावण वध के बाद लगता है कवर्धा राजपरिवार का दरबार

शाही दशहरे की अनूठी परंपरा देखने और राजपरिवार के दर्शन के लिए उमड़ते हैं श्रद्धालु।

Admin Chhattisgarh Media
20 Oct 2026 · 1 views
रावण वध के बाद लगता है कवर्धा राजपरिवार का दरबार

कवर्धा (कबीरधाम)। छत्तीसगढ़ के कबीरधाम जिले में कवर्धा राजपरिवार का शाही दशहरा अपनी ऐतिहासिक परंपरा और राजसी वैभव के लिए विशेष पहचान रखता है। करीब 274 साल पुरानी यह परंपरा आज भी उसी उत्साह और आस्था के साथ निभाई जा रही है। विजयादशमी के अवसर पर राजपरिवार के दर्शन करने के लिए कवर्धा सहित आसपास के ग्रामीण और दूरस्थ क्षेत्रों से बड़ी संख्या में लोग पहुंचते हैं। मान्यता है कि दशहरे के दिन राजा के दर्शन करना शुभ होता है। यही वजह है कि हर साल शाही दशहरे को लेकर लोगों में खास उत्साह देखने को मिलता है।

वर्ष 1751 में कवर्धा राजपरिवार की राजगद्दी की स्थापना के साथ इस परंपरा की शुरुआत मानी जाती है। इतिहासकारों के अनुसार, तत्कालीन महाराज स्वर्गीय महाबली सिंह ने शाही दशहरे की परंपरा प्रारंभ की थी। तब से लेकर आज तक राजपरिवार विजयादशमी पर विशेष आयोजन करता आ रहा है। सजे-धजे शाही रथ, आकर्षक बग्गियां, बैंड-बाजे और नगर भ्रमण इस आयोजन के प्रमुख आकर्षण हैं।

मोती महल से निकलेगा शाही रथ, दर्शन को जुटेंगे लोग

विजयादशमी पर कवर्धा स्टेट के राजा योगेश्वर राज सिंह और राजकुमार मैकलेश्वर राज सिंह शाम को मोती महल से शाही रथ पर सवार होकर नगर भ्रमण के लिए निकलेंगे। इस दौरान वे नगरवासियों का अभिवादन स्वीकार करते हुए आगे बढ़ेंगे। राजपरिवार के महल से बाहर निकलते ही परिसर में एकत्रित लोग दर्शन कर जयकारे लगाते हैं।

शाही रथ और सजी हुई बग्गियों के साथ निकलने वाली यह परंपरागत यात्रा कवर्धा के दशहरा उत्सव का प्रमुख आकर्षण है। नगर भ्रमण के दौरान बड़ी संख्या में लोग राजपरिवार के दर्शन के लिए सड़कों पर जुटते हैं। इस आयोजन में ऐतिहासिक परंपरा, जनआस्था और स्थानीय संस्कृति की झलक देखने को मिलती है।

सुबह कुलदेवी के दर्शन, फिर होगा शस्त्र पूजन

शाही दशहरे की शुरुआत धार्मिक अनुष्ठानों के साथ होती है। इतिहास के जानकार आदित्य श्रीवास्तव के अनुसार, विजयादशमी की सुबह राजपरिवार के प्रमुख सदस्य और राजकुमार स्नान के बाद पाली पारा स्थित कुलदेवी मां दंतेश्वरी मंदिर सहित नगर के प्रमुख मंदिरों में दर्शन-पूजन करते हैं। इसके बाद राजमहल पहुंचकर शस्त्र पूजन की परंपरा निभाई जाती है।

धार्मिक अनुष्ठानों के बाद शाम को शाही रथ के साथ नगर भ्रमण और रावण दहन का कार्यक्रम आयोजित होता है। इस तरह कवर्धा का शाही दशहरा धार्मिक आस्था के साथ राजपरिवार की ऐतिहासिक परंपरा को भी जीवंत बनाए रखता है।

सरदार पटेल मैदान में जलेगा 35 फीट ऊंचा रावण

शाम करीब पांच बजे राजमहल से शाही रथ बैंड-बाजे के साथ सरदार पटेल मैदान पहुंचेगा। यहां राजपरिवार की ओर से तैयार किए गए करीब 35 फीट ऊंचे रावण के पुतले का दहन किया जाएगा। परंपरा के अनुसार, बाल स्वरूप में भगवान राम और लक्ष्मण की भूमिका निभाने वाले बालक रावण दहन करेंगे।

रावण दहन के बाद विजय रथ के साथ नगर भ्रमण किया जाएगा। इस दौरान राजपरिवार की ओर से नगरवासियों की खुशहाली, सुख-समृद्धि और तरक्की की कामना की जाएगी। इस आयोजन को देखने के लिए हर साल बड़ी संख्या में लोग मैदान और आसपास के क्षेत्रों में एकत्रित होते हैं।

रावण दहन के बाद राजमहल में लगेगा दरबार

शाही दशहरे की एक खास परंपरा रावण दहन और नगर भ्रमण के बाद राजमहल में दरबार लगना है। इस दौरान नगरवासी राजपरिवार से भेंट करते हैं और राजा लोगों का अभिवादन स्वीकार करते हैं। राजदरबार में लोगों की उपस्थिति इस ऐतिहासिक आयोजन को विशिष्ट बनाती है।

करीब पौने तीन शताब्दी से चली आ रही कवर्धा की यह परंपरा आज भी स्थानीय लोगों के लिए विशेष महत्व रखती है। बदलते समय के बीच शाही रथ, धार्मिक अनुष्ठान, रावण दहन और राजदरबार की रस्में कवर्धा की ऐतिहासिक विरासत और सांस्कृतिक पहचान को आगे बढ़ा रही हैं।

 
 
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